//कुछ मुक्तक – कवि लोकेश कुमार द्वारा

कुछ मुक्तक – कवि लोकेश कुमार द्वारा

तुम्हारा ही रहूँगा मैं

अगर सरिता बनो तुम तो किनारा ही रहूँगा मैं
अगर तुम ना मिली मुझको कुँवारा ही रहूँगा मैं
सिर्फ़ एक जन्म का ये हैं नहीं,वादा हैं जन्मों का
तुम्हारा था,तुम्हारा हूँ,तुम्हारा ही रहूँगा मैं

अदावत कश्तियों से हो तो साहिल छूट जाता हैं
सपन में क्या तुम्हें देखु सपन तो टूट जाता हैं
तुझको छोड़ कर खुद से ही मैं रुस्वा हो जाता हूँ
तुझे अपना बना लू तो ज़माना रूठ जाता हैं

वफ़ा की हर कहानी और हर इक किस्से में ज़िंदा हूँ
इश्क़ में टूट कर बिखरे हर इक शीशे में ज़िंदा हूँ
भले हो मिल चुकी मिट्टी में मेरे जिस्म की मिट्टी
मुझे महसूस करना मैं तेरे हिस्से में ज़िंदा हूँ

प्रज्वलित दीप के तल में छिपे अंधियार जैसे थे
अनृत विश्वास के खंजर के वंचक वार जैसे थे
हमेशा साथ देने के किए वादें तो थे तूने
तेरे वादें सभी लेकिन किसी सरकार जैसे थे

तेरी अपना बनाने की अदा भी क्या गज़ब की थी
मेरे दिल में समाने की अदा भी क्या गज़ब की थी
कभी नज़रे मिलाकर तुम हमारे हो गए तो थे
मग़र नज़रे चुराने की अदा भी क्या गज़ब की थी

ये साज़िश नफ़रतों की है मुझे बदनाम करना हैं
सुना कर दर्द दुनिया को मुझे तो नाम करना हैं
न जाने कौनसे अपराध से ये बेड़िया पायी
निकल कर क़ैद से साँसों की मुझे आराम करना हैं

दीवानेपन के रंग में यूं ढल ही जाते हैं
इश्क़ में पत्थर से दिल पिघल ही जाते हैं
खुद से भी ज़्यादा तुम यक़ी न इश्क़ पे करना
आख़िर में लोग अक्सर बदल ही जाते हैं

क़तरा क़तरा जुटा के समंदर बनाऊंगा
ठाना है तुझको अपना मुक़द्दर बनाऊंगा
तुमने ही पग रखे हैं मेरे दिल की देहरी पर
अब मैं भी तेरे दिल में अपना घर बनाऊंगा

ग़र तुम ना बदल जाते तो कुछ बात और थी
या हम खुद ही संभल जाते तो कुछ बात और थी
ज़िन्दगी तो जी ही लेंगे संग और के मगर
तुम ही हमे मिल जाते तो कुछ बात और थी

About the Author

Name: Lokesh Kumar
About

कवि लोकेश कुमार एक छोटे से गाँव खेड़ा सामोर(आसपुर) से हैं
जिन्होंने कृषि विज्ञान में स्नातक एवं व्यवसाय प्रबंधन का अध्ययन किया हैं।साहित्यिक रचनाओं में प्रारंभ से रूचि होने के कारण भिन्न संकाय का विद्यार्थी होने पर भी हिंदी से भिन्न नही हो सके
वर्तमान में उदयपुर में विभिन्न कृषि शिक्षण संस्थानों में कृषि का अध्यापन कर रहे हैं